मायावती ने इस्तीफा देकर वोट बैंक को सहेजने का खेला ये दांव

लखनऊ। मायावती ने सहारनपुर हिंसा पर सदन में बोलने के लिए कम वक्त दिए जाने से नाराज होकर राज्‍यसभा की सदस्‍यता से इस्‍तीफा दे दिया। हालांकि मायावती ने इस्तीफा देकर ये साबित करने की कोशिश की है कि वे दलितों के मुद्दों को लेकर कितनी संजीदा हैं। देखा जाए तो मायावती के इस्तीफे से सियासी गलियारों में एक नई तरह की बहस छिड़ गई। मायावती ने जहां खुद को डॉ. भीमराव अंबेडकर के पदचिन्ह पर चलने का दावा किया तो बीजेपी पर जातिवादी राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप भी लगाया है।

दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश!
हालांकि मायावती के नेतृत्व में बीएसपी की सियासी ताकत लगातार घटती गई है। 2017 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाने और उत्तर प्रदेश विधानसभा में महज 19 सीटों पर सिमट जाने से मायावती के सामने खतरे की घंटी बजने लगी है। अगर थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो 2007 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने 30.43 फीसदी वोट पाकर उत्तर प्रदेश में 206 सीट जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार भी बनाई थी। लेकिन महज पांच साल बाद ही मायावती को समाजवादी पार्टी से मुंह की खानी पड़ी। बसपा का वोट शेयर भी घटकर तकरीबन 26 फीसदी रह गया।

साफ है कि 2007 के बाद से बसपा का वोट शेयर लगातार गिरता गया और 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता तक नहीं खुला। वहीं 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ 19 सीट ही अपने पाले में कर सकी। यानी मायावती की सियासी जमीन दरकती गई तभी तो उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा की इतनी ताकत भी नहीं रह गई है कि वे अपनी पार्टी सुप्रीमो को दोबारा राज्यसभा भेज पाएं। अब सियासी जानकार इस मुद्दे पर वाद-विवाद करते नजर आ रहे हैं कि मायावती का इस्तीफा क्या दलित वोट बैंक को बसपा के झंडे तले लाने की रणनीति का हिस्सा है।

दरअसल उत्तर प्रदेश में गैर-जाटव दलित वोटरों का झुकाव बीजेपी की तरफ रहा है। पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने एक रणनीति के तहत रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद तक पहुंचा कर दलित वोट बैंक में सेंध लगाने का दांव चला है। बीजेपी की इस रणनीति से मायावती कैंप में खलबली मची है। यही वजह है कि मायावती ने इस्तीफा देने के लिए जबरदस्त रणनीति अपनाई है। मायावती ने प्रश्नकाल में सहारनपुर में दलितों की मारपीट का मुद्दा उठाया। वे पहले से ही जानती थीं कि नियम के मुताबिक प्रश्नकाल के दौरान उठाए गए किसी भी मुद्दे पर कोई सदस्य तीन मिनट से ज्यादा नहीं बोल सकता। इसके बावजूद उन्होंने बोलने के लिए कम वक्त देने का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया।

आखिर मायावती की रणनीति क्या है?
मायावती ने इस्तीफा देकर ये साबित करने की कोशिश की है कि दलितों के मुद्दे पर वे त्याग के लिए तैयार रहती हैं। साथ ही उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की है कि डॉ. भीमराव आंंबेडकर ने जिस तरह से जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया था वैसे ही दलितों के हक की आवाज बुलंद करने के लिए इस्तीफा देने का माद्दा रखती हैं। साथ ही मायावती ये संदेश देना चाहती हैं कि बीजेपी ने एक दलित नेता की आवाज को दबाने की कोशिश की है जिससे ये साबित किया जा सके कि बीजेपी दलित विरोधी पार्टी है। देखा जाए तो राज्यसभा में मायावती के महज नौ महीने का कार्यकाल ही बचा था ऐसे में इस्तीफा देकर वे बीजेपी विरोधी सियासत का चेहरा बनना चाहती हैं। साथ ही विपक्षी दलों पर भी ये दबाब बढ़ गया है कि वे मायावती को फिर से राज्यसभा में भेजें क्योंकि खुद बसपा के पास इसके लिए संख्या बल नहीं है।

साफ है कि मायावती का इस्तीफा एक साथ कई मर्ज की दवा है। मायावती अचानक से इस्तीफा देने के बाद से सियासी चर्चा की केंद्र में आ गई हैं। वहीं दलित वोटरों को भी ये संदेश देने की कोशिश की है कि बसपा छोड़ कर कोई पार्टी उनकी परवाह नहीं करता तो बीजेपी की भी दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश पर करारा प्रहार करने का भी सियासी दांव मायावती ने चला है।

कैप्टन की तर्ज पर मायावती की सियासत!
देखा जाए तो सतलज-यमुना लिंक के मुद्दे पर कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नवंबर 2016 में लोकसभा से इस्तीफा दिया था। इसके बाद पंजाब में हुए विधानसभा चुनाव में कैप्टन के कमान में कांग्रेस ने जीत का परचम लहरा दिया था। साफ है कि कैप्टन के इस्तीफे से उनके लिए पंजाब में सहानुभूति की लहर उमड़ पड़ी थी। पंजाब की जनता ने उन्हें राज्य के हित के लिए कुर्बानी देने वाले नेता की तरह हाथों हाथ लिया।

देखा जाए तो मायावती ने भी कैप्टन के तर्ज पर इस्तीफा देकर यूपी में अपने कोर वोटरों को संदेश देने की कोशिश की है। हो सकता है कि पिछली कई हारों से सबक लेते हुए मायावती अभी से 2019 की लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई हैं। उनकी तैयारियों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर दलित वोटों को एकजुट करना है और उनका इस्तीफा तो बस शुरूआत है। आगे आने वाले वक्त में मायावती कई ऐसे मुद्दों को जोर शोर से उठा सकती हैं जिससे वे साबित कर सकें कि दलितों के हितों का अगर कोई ध्यान रखता है तो वह बसपा ही है। क्योंकि मायावती के आलोचकों का ये कहना है कि आज की बसपा कांशीराम की बसपा नहीं है, यह उनके आदर्शो से बहुत दूर जा चुकी है। हो सकता है कि मायावती इस नजरिए को बदलने के लिए पूरी ताकत झोंके। ऐसे में आगे आने वाले वक्त में उनकी रणनीति पर पूरे देश की नजर टिकी रहेगी।

 

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